Old Testament
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मत्ती 1:16 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
याकूब से यूसुफ उत्पन्न हुआ, जो मरियम का पति था, और मरियम से* यीशु उत्पन्न हुआ जो मसीह कहलाता है।
मत्ती 1:16 पद-दर-पद बाइबल टीका
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मत्ती 1:16 समानांतर पद और संबंधित वचन
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मत्ती 27:17 (HINIRV) »
अतः जब वे इकट्ठा हुए, तो पिलातुस ने उनसे कहा, “तुम किसको चाहते हो, कि मैं तुम्हारे लिये छोड़ दूँ? बरअब्बा को, या यीशु को जो मसीह कहलाता है?”

लूका 3:23 (HINIRV) »
जब यीशु आप उपदेश करने लगा, तो लगभग तीस वर्ष की आयु का था और (जैसा समझा जाता था) यूसुफ का पुत्र था; और वह एली का,

मत्ती 27:22 (HINIRV) »
पिलातुस ने उनसे पूछा, “फिर यीशु को जो मसीह कहलाता है, क्या करूँ?” सब ने उससे कहा, “वह क्रूस पर चढ़ाया जाए।”
मत्ती 1:16 – तत्काल पृष्ठभूमि और विचार
यह वचन निष्कासन-प्रकार की जननीकथा के संदर्भ में आता है, जहाँ यीशु के वंशावली के क्रम की सूची पूरी होती है। यह बताता है कि मरियम के पति यूसुफ के साथ यीशु का जन्म कैसे हुआ और किस तरह मसीह के रूप में उनकी भूमिका निर्धारित होती है। यह पंक्ति याकूब से यूसुफ, मरियम के पति, और मरियम से यीशु के जन्म की पुष्टि करती है—यानी यीशु मानव-वंश के माध्य से जन्म लेने वाले मसीह हैं, जो परमेश्वर की योजना के अनुसार आशीष और उद्धार के माध्यम बनते हैं।
ईश्वर और विश्वास के बारे में पाठ से निकलने वाले संकेत
1) परमेश्वर की चलाई गई योजना: यह वंशावल्यणी में यह संकेत देता है कि यीशु का जन्म पहले से निर्धारित योजना का हिस्सा है, जिसे वे समय पर पूरा करते हैं।
2) मानवीय मान्यता के साथ दिव्य क्रिया: मरियम की स्थिति और यूसुफ की भूमिका एक साथ यह दिखाती है कि ईश्वर मानवीय इतिहास को पवित्र पथ पर ले जाते हैं—माता-पिता के कर्तव्य और परमव्यवस्था की संयुक्त क्रिया।
3) मसीही पहचान की स्थापना: “जो मसीह कहलाता है” यह टेक्स्ट यीशु की दैविक-मानवीय पहचान को दोनों कथनों में समाहित कर देता है—यही मसीहत्व का मूल तत्त्व है।
प्रमुख शब्दों/चित्रों की स्पष्टता
• याकूब से यूसुफ: यह बताता है कि यीशु का क्रमानुसार जन्म दायित्वपूर्ण पारिवारिक इतिहास से जुड़ा है; माँ मरियम के साथ उनका वैवाहिक संबंध संकेत है, पर यीशु का जन्म अहिंसक रूप में मरियम से हुआ है।
• मरियम से यीशु: यह पिता-केन्द्रित पंक्ति नहीं बल्कि जन्मकथा की पवित्रता और ईश्वर की चमत्कारी क्रिया का प्रमाण है।
• मसीह कहलाता है: यह शीर्षक यीशु के सशक्त संदेश और भूमिका को इंगित करता है—जो उद्धारकर्ता के रूप में क्रिया-निश्चय को साकार करते हैं।
संबद्ध पाठ (Cross-references) — छोटे निष्कर्ष के साथ
• लूका 1–2: मरियम के गर्भधारण और यीशु के जन्म का विस्तृत विवरण—ईश्वर की योजना बनाम मानवीय मानवता का मिलन।
• मरकूस 1:1: यीशु के आगमन की तात्कालिक उद्गम-धारा; मसीह के आगमन का उद्घोष।
• जॉन 1:14: शास्त्रीय पाठ जो यह दिखाता है कि वचन मानव बना, और मसीह को पूर्ण रूप में प्रकट करता है।
इन उपक्रमों से स्पष्ट होता है कि यीशु का जन्म एक प्राचीन वायदे का क्रियान्वयन है, जिसमें ईश्वर की पवित्रता और मानवता के बीच अलौकिक संबंध स्थापित होता है।
आज के संदर्भ में आवेदन
• ईश्वर की योजना पर भरोसा: जब जीवन में एकत्रित परिवार-जीवन और बड़े उद्देश्य मिलते हैं, तो हमें याद दिलाता है कि भगवान अपने समय और क्रम में कार्य करते हैं।
• पवित्र निष्ठा की प्रेरणा: मरियम और यूसुफ की प्रतिक्रिया—आध्यात्मिक धैर्य और विश्वास—हमें भी मुश्किल परिस्थितियों में ईश्वर की योजनाओं के अनुरूप आज्ञाकारिता की सीख देती है।
• मसीह की पहचान: हमारे जीवन में भी “मसीह कहलाने” का अर्थ है कि हम अपने हर कार्य में यीशु के अध्ययन और सेवा को प्रमुख रखें—उन्हीं के मार्ग पर चलना जीवन का लक्ष्य बन जाए।
कथन-उद्धरण (पवित्र-ग्रंथ के समान स्रोतों से)**
नोट: नीचे निर्णायक पंक्तियाँ प्रसिद्ध सार्वजनिक-डोमेन वर्णनों से उद्धृत हैं; यदि पाठ सीधे उद्धृत हो तो उद्धरण संकेत दिए जाते हैं:
ये टिप्पणीगत विचार Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन दृष्टिकोणों से संगत हैं और एक समेकित, संतुलित दार्शनिक-कथा प्रस्तुत करते हैं।