Old Testament
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यशायाह 65:25 का संदर्भअनुवाद और अर्थ
यह वचन यशायाह के उस भविष्यवाणी खंड का भाग है जहाँ परमेश्वर के राज्य के समय की शांति और पुनर्स्थापना का चित्रण किया गया है। इतिहास में चिह्नित अन्य समयों की विपत्ति के बाद यह सकारात्मक दृश्य बताता है कि परमेश्वर अपने लोगों के बीच नये वातावरण का निर्माण करेंगे, जहां शांति और सुरक्षा टूट-फूट को नष्ट कर देंगे। इस वचन में हिंसा के संकेत कम होने लगते हैं—प्रकृति के दुश्मन पूरक रूप से मित्र बनते हैं और जीवन धीरे-धीरे निर्भय बनता है।
मुख्य विचार
इस वचन में चार प्रमुख तथ्य उभरते हैं: (1) मृग-भेड़िये जैसे भविष्य के हिंसक जीव भी एक साथ चरेंगे; (2) सिंह भूसे के समान खाएगा, अर्थात् ऊर्जावान और आक्रामक प्रवृत्तियाँ शांत और संयमित होंगी; (3) सर्प का आहार मिट्टी तक सीमित रहेगा, जो जीवन के पहले से जुड़े भय और खतरे को कम करता है; (4) परमेश्वर के पवित्र पर्वत पर सभी के लिए भ्रातृत्व और सुरक्षा का समय है—किसी को किसी की हानि नहीं होगी। यह सब एक परम शांति-राज्य की तस्वीर है।
तीन प्रमुख विषय
संबद्ध पाठ और उनके संक्षिप्त संकेत
- इस भविष्यवाणी के कई हिस्से पुराने पूर्वकथाओं के साथ संबद्ध रूप में शांति-राज्य की उम्मीद दर्शाते हैं; (1) भविष्य में हिंसा का समाप्त होना; (2) सृष्टि के पुर्नस्थापन का स्वरूप; (3) परमेश्वर के राज्य के भीतर एक नया सामाजिक-आर्थिक बराबरी का मानदंड।
व्यावहारिक विचार
हमारे जीवन में इस वचन से प्रेरणा मिलती है कि परमेश्वर की इच्छा शान्ति और सुरक्षा के उत्पादक थे। चाहे व्यक्तिगत आंतरिक संघर्ष हों या सामाजिक टकराव, ईश्वर की राजसी नीति में रिश्ते सुधरते हैं, भय घटते हैं और आशा दृढ़ होती है। विद्यार्थियों, परिवारों और समुदायों के लिए यह प्रेरणा है कि हमारे अवरोधों के बावजूद परमेश्वर की योजना शांति की यात्रा है।
क्रॉस-रेफरेंस (संक्षेप व्याख्या)
- प्रकाशित भविष्यवाणी के संदर्भ में यशायाह 11:6-9 से मिलता-जुलता चित्र: शांति और सहयोग का सामूहिक जीवन; क्यों कि हया- V.
- रोमियों 8:21-22 में सृष्टि की उद्धार-आशा को प्रकृति के मुक्ति-आह्वान के रूप में देखा गया है, जिसे इस अध्याय की दृष्टि से समझना संभव है।
- ल्यूक 1:79 में अंधेरे के निवर्तन और प्रभु के पथ-निर्देशन की प्रतीक्षा का संदर्भ भी इस शांति-राज्य के प्रवाह को समर्थ बनाते हैं।
कथा-सार और समापन
यशायाह 65:25 में जिस भविष्य की कल्पना की गई है, वह परमेश्वर के पवित्र पर्वत पर न्याय-शांति की तस्वीर है। यह केवल बाहर की हिंसा का अंत नहीं, बल्कि हर दिल में मित्रता, सुरक्षा और संतोष की स्थापना है। मार्मिक संकेत है कि परमेश्वर पुराने दर्द को दूर करते हुए एक नया संसार बनाते हैं—जहां भय और पीड़ा नहीं, बल्कि प्रेम और स्नेह Priya की गूँज हो।
इस संदेश के संग 2-3 उद्धृत तत्व जो प्रसिद्ध पुरानी स्रोतों से जुड़ते हैं, परन्तु पूर्ण पाठ नहीं दिये गए हैं, ताकि मूल संदर्भ के भीतर एक संतुलित समझ बनी रहे।