Old Testament
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यशायाह 65:9 का अर्थ – मैं याकूब से एक वंश और यहूदा से पर्वतों का एक वारिस बनाऊँगा
इस पद का मूल संदेश है कि परमेश्वर अपने चुने हुए लोगों के समूह में कभी-कभी एक विशेष, प्रेरित वारिस बनाए रखता है—याकूब के वंश में एक रचना और यहूदा के क्षेत्रीय चयन के साथ। इसमें यह भी संकेत मिलता है कि परमेश्वर के वादे विश्व-व्यापी नहीं हैं, बल्कि उनके चुने हुए लोगों के भीतर विशिष्ट नियंत्रण और पुनर्स्थापना का काम चल रहा है।
संदर्भ और पृष्ठभूमि
यशायाह की पुस्तक में परमेश्वर के उद्धार के वादे समय-समय पर अत्यंत विलक्षण रूप से विभाजित होकर प्रस्तुत होते हैं। 65 वें अध्याय में उद्धार, नूतन निर्माण और शांति की आशा प्रमुख है। यह भाग यह स्पष्ट करता है कि ईश्वर अपने चहेतों के साथ एक स्थिर और सुरक्षितCommunea बनाने के उद्देश से निवास-स्थल की पुनर्स्थापना करेगा। यहाँ “याकूब में से एक वंश” और “याहूदा के पर्वतों का एक वारिस” का प्रयोग एक प्रकार की एकता-सीमांकन को दिखाता है: उनका चुना हुआ समुदाय एक साथ एक ही परमेश्वर के संरक्षण में रहेगा।
व्याकरणिक-interpretive observations
थीमैटिक बिंदु
अन्य प्रार्थना-सम्बद्ध पद (क्रॉस-रेफरेंसेस)
1) इब्रानियों 11:9-10— वफादारी के साथ अविधेय स्थल की प्रतीक्षा; विश्वासियों का भविष्य परमेश्वर के शहर में है।
2) यहूदा 1:24-25— परमेश्वर की सुरक्षा और उद्धार-योजना का निर्णायक अन्तिम परिणाम: उसकी महिमा बने रहती है।
3) रोम 11:26— यहूदियों के संदर्भ में उद्धार के व्यापक उद्देश्य और पूरे विश्व में ईश्वर के न्याय का विस्तार।
संक्षिप्त व्यावहारिक takeaway
ईश्वर के वादे कभी रुकते नहीं। यदि हम परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं, तो हमारा जीवन भी उनके क्षेत्र-निर्देशन और सुरक्षा के अंतर्गत रहता है। विश्वास, आजीवन आशा और समुदाय के साथ रहने का आग्रह यह है कि हम ईश्वर की योजना का हिस्सा बने रहें और अपने स्थान, भूमिका और दायित्वों के प्रति जागरूक रहें।
इतिहास-सम्भोगी टीका (संक्षेप)
यशायाह के पथ पर, पुराने इनके संकेत और भविष्य-उद्धार का एक सुसंगत समन्वय दिखता है। मॉडर्न टिप्पणीकारों के संकेतों के अनुसार, यह वाक्य परमेश्वर के चयन-नियम और पुनर्स्थापना के विचार की पुष्टि करता है, जिससे यहूदियों और उनके दास-समुदाय के लिए एक स्थिर आशा का पथ बनता है।
इस पाठ की छोटी-सी उद्धृतता—Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के मौलिक वाक्यों के शब्द-अनुकृति उपलब्ध हों तो उन्हें यहाँ उल्लेखित किया गया है, पर यहाँ संक्षेप में मुख्य संदेश ही प्रस्तुत है।