Old Testament
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यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66Verse
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यशायाह 65:3 का immédiate सेटिंग और संदर्भ
यहविायाह के भाग में यह वचन उन लोगों के बारे में है जो परमेश्वर से विमुख होकर अज्ञान और अंध विश्वास में जीते हैं। पवित्र लेखन स्पष्ट करता है कि वे बारियों के बीच बलि चढ़ाने और ईंटों पर धूप जलाने के माध्यम से परमेश्वर को क्रोध दिलाते हैं—ऐसे कर्म जो सीधे परमेश्वर की इच्छा के विपरीत और वैवाहिक-उपासनाओं के बजाय दूसरों के धर्म-आडंबर पर टिके हैं। यह शास्त्रीय रूप से याकूब-सीखे हुए प्रतीकों को उलट देता है: परमेश्वर जो दया और सत्य की ईमानदारी चाहता है, वही लोग भक्ति के नाम पर दिखावटी कर्म करते हैं।
ईश्वर के बारे में पाठ से दर्शित बातें
1) ईश्वर के साथ वास्तविक सम्बन्ध न होने पर भी वे पूजा-आडंबर करते हैं; परन्तु उनका हृदय क्रोध का आवेश है। यह दिखाता है कि भक्ति केवल बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि हृदय की प्रेरणा और विश्वास का प्रमाण है।
2) परमेश्वर की अनुग्रह-करुणा के विरुद्ध यह क्रियात्मक पूजा शपथ-उलटी है—वे ईश्वर के सामने भी अन्य देवताओं के समान व्यवहार और दुराचार करते हैं, जो उसे प्रमुखता नहीं देते।
शब्दों और imagery के स्पष्कार
- “बारियों में बलि चढ़ा-चढ़ाकर”: बारियों के बीच अस्थिर, अयोग्य परंपराओं के अपराध का संकेत। सामाजिक-धार्मिक रस्म-रिवायतों में दिखावटी पूजा का चित्रण।
- “ईटों पर धूप जला-जलाकर”: धार्मिक अनुष्ठानों के बाह्य पद्धति पर जोर, जबकि संपूर्ण आत्मा-समर्पण गायब। यह दर्शाता है कि परमेश्वर ऐसी दिखावटी पद्धतियों को नहीं मानते।
अन्य पवित्र ग्रंथ से संबंध (Cross-references)
पवित्र-आस्था का आधुनिक उपयोग
आज का पाठ हमें यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति दिल से उभरती है—ईश्वर के प्रति आत्मिक समर्पण, न्यायप्रिय व्यवहार और समाज के प्रति करुणा। बाह्य रीति-रिवाज भले हों, यदि हृदय में परमेश्वर का भय और प्रेम नहीं है, तो वे खाली दिखावा बन जाते हैं। आत्म-परिक्षण करें: क्या मेरी पूजा-प्रार्थनाओं के साथ मेरी जिंदगी में न्याय, दया और सत्य की क्रियाएं संगत हैं?
हिंदी उद्धरण और ध्यान
यदि आप चाहें, मैं Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डायमंड उद्धरणों से 2-3 छोटे वाक्य शामिल कर सकता हूँ; कृपया बताएं।
कुल मिलाकर यह वचन हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर का आह्वान है कि हम भक्ति को जीवन-चर्या में ढाल दें—ताकि हमारे कर्म और हमारे ईश्वर-सम्बन्ध एक दूसरे से मेल खाते रहें।