Old Testament
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यहोशू 7:5 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
तब आई के रहनेवालों ने उनमें से कोई छत्तीस पुरुष मार डाले, और अपने फाटक से शबारीम तक उनका पीछा करके उतराई में उनको मारते गए। तब लोगों का मन पिघलकर जल सा बन गया।
यहोशू 7:5 पद-दर-पद बाइबल टीका
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यहोशू 7:5 समानांतर पद और संबंधित वचन
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यहोशू 2:11 (HINIRV) »
और यह सुनते ही हमारा मन पिघल गया, और तुम्हारे कारण किसी के जी में जी न रहा; क्योंकि तुम्हारा परमेश्वर यहोवा ऊपर के आकाश का और नीचे की पृथ्वी का परमेश्वर है।

लैव्यव्यवस्था 26:36 (HINIRV) »
और तुम में से जो बचा रहेंगे और अपने शत्रुओं के देश में होंगे उनके हृदय में मैं कायरता उपजाऊँगा; और वे पत्ते के खड़कने से भी भाग जाएँगे, और वे ऐसे भागेंगे जैसे कोई तलवार से भागे, और किसी के बिना पीछा किए भी वे गिर पड़ेंगे।

यहोशू 2:9 (HINIRV) »
इन पुरुषों से कहने लगी, “मुझे तो निश्चय है कि यहोवा ने तुम लोगों को यह देश दिया है, और तुम्हारा भय हम लोगों के मन में समाया है, और इस देश के सब निवासी तुम्हारे कारण घबरा रहे हैं।
संदर्भ और संक्षिप्त व्याख्या
यह श्लोक (यहोशू 7:5) अयालोन घाटी के युद्ध के प्रसंग का भाग है। इस घटना में यहोशू के सेनापति और इस्राएल की सेना पर प्रतिद्वंद्वी नगरों के निवासियों ने जोरदार हमला किया और पीछा करते हुए बहुतों को मार डाला। परिणामस्वरूप यहोशू की सेनाओं में भय और हताशा फैल गई—“लोगों का मन पिघलकर जल सा बन गया।” पूरा प्रसंग अछानक पराजय और उसके बाद की आत्म-निरीक्षण की पृष्ठभूमि तैयार करता है, जो आगे जाकर आरोन और झूठी विजय का कारण जानने के लिए जांची जाएगी।
मुख्य अर्थ
मुख्यत: यह श्लोक बताता है कि यहोशू की सेना ने अपेक्षित विजय नहीं पाई; शत्रु ने पलटवार कर दिया और पीछा करते हुए बड़ा विनाश किया। मनोवैज्ञानिक असर दोहरे हैं: बाह्य पराजय और आंतरिक धैर्य का टूटना। “मन पिघलकर जल सा बन गया” का अर्थ है भय, भ्रम और नेतृत्व पर असमर्थता—जो आगे की नैतिक और आध्यात्मिक जाँच की आवश्यकता को जन्म देता है।
कुंजी विषय
संबंधित शास्त्रपद
हम इस श्लोक को इन अन्य स्थानों से जोड़कर समझ सकते हैं:
व्यावहारिक प्रतिबिंब
व्यवहारिक दृष्टि से यह श्लोक हमें सिखाता है कि किसी भी घटित पराजय के बाद त्वरित आत्म-दानव और भय मन की स्पष्टता छीन लेते हैं। कठिनाई आने पर समुदाय को शांत विश्लेषण, नेतृत्व की स्पष्टता और कारण-खोज की आवश्यकता होती है न कि पैनिक प्रतिक्रिया। व्यक्तिगत जीवन में भी जब परिप्रेक्ष्य खो जाता है, तो ठहर कर स्थिति का मूल्यांकन करने, गलतियों को मानने और सुधार की योजना बनाने की आवश्यकता होती है।
पुरातन टिप्पणी–संक्षेप
मैथ्यू हेनरी, अल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क जैसे पारंपरिक टिप्पणीकारों ने इस प्रसंग पर विचार किए हैं। कुछ मौलिक विचार जिनका सार यहाँ उपयोगी है: दोष और अवज्ञा का परिणाम अक्सर सामरिक पराजय होता है; भय का घटित होना मानव स्वाभाविक प्रतिक्रिया है, परन्तु उसे प्रभु के सामने खोजना बेहतर प्रतिक्रिया है। (यदि किसी टिप्पणीकार के शब्दों का सटीक उद्धरण प्रस्तुत किया गया होता तो उसे यहां छोटा उद्धरण के रूप में दिखाया जा सकता था।)
संक्षेपिक समापन
यहोशू 7:5 हमें सिखाता है कि बाह्य पराजय के पीछे आंतरिक कारण हो सकते हैं और भय का ऊँचा प्रसार समुदाय को पंगु कर देता है। यह श्लोक आगे की जांच और सुधार—जो प्रभु के साथ निष्ठा और आज्ञा की ओर लौटने से जुड़ा है—के लिये पृष्ठभूमि तैयार करता है। पराजय के क्षण में स्थिरता, आत्म-निरीक्षण और परमेश्वर के मार्गदर्शन की खोज ही पुनर्निर्माण का मार्ग है।