Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 31:18 का संदर्भ और अर्थ
यिर्मयाह के संदेश में यह वाक्य वेदना और जागरूक आत्म-स्वीकृति का प्रतीक है। एप्रैम (यिर्मयाह में इस्राइल के उत्तर- राष्ट्र के रूपक के रूप में) अपने निज़ी गिरावट और ताड़ना को अनुभव कर रहा है, परन्तु परमेश्वर की कष्टपूर्ण दया का आह्वान है कि वह फिर से लौट आये। यह पाठ बताता है कि भयावह दंड के बीच भी परमेश्वर के प्रति पश्चात्ताप और उद्धार की राह खुली है।
केंद्रीय विचार
कहावत “तूने मेरी ताड़ना की, और मेरी ताड़ना ऐसे बछड़े की सी हुई जो निकाला न गया हो” के माध्यम से कहा गया है कि पाप के कारण व्यक्ति तथा राष्ट्र परमेश्वर से विमुख हो जाते हैं, परन्तु ताड़ना के बाद भी लौट आने की सम्भावना बनी रहती है। परमेश्वर निष्कपट प्रेम के साथ रोधन करता है ताकि वह फिर लौटे और एक बार फिर से उसका स्वामी-भाव बन जाए।
मुख्य थीम्स
सांझे पड़ने वाले पाठ
कई प्राचीन टिप्पणीकारों ने इस अध्याय में ताड़ना के समय के भीतर कृपालु पुनर्लाभ की आशा को उजागर किया है। मैथ्यू हेनरी, ऐल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के विचारों के सार से दिखाई देता है कि परमेश्वर अपने किस्म के प्रेम को कभी समाप्त नहीं करते; वह जब पश्चाताप को स्वीकार कर लेते हैं, तो पापी भी नई जिंदगी पा सकता है। (कमेंट्री उद्धरण: हलके शब्दों में, 'तू मेरा परमेश्वर है' कहना स्व-स्वीकृति का संकेत है।)
अनुप्रयुक्त क्रियात्मक विचार
- यह verse हमें यह सिखाता है कि जब हम गलती करते हैं, तो डरना नहीं चाहिए, बल्कि नम्र होकर परमेश्वर के सामने लौटना चाहिए।
- जीवन-पथ में बार-बार गिरना संभव है, परन्तु सच्चा पश्चाताप और ईमानदार वापसी ही पुनःस्थापना की कुंजी है।
पठन-बंधु संदर्भ
1) यिर्मयाह 3:22-23 – प्रभु की ओर लौटना ही उद्धार का मार्ग है; यह पथ अवश्य है।
2) होशे 14:1-4 – पश्चाताप और नयी शुरुआत का संदेश
3) यशायाह 55:6-7 – परमेश्वर के पास लौटना और अनुग्रह पाना संभव है
संक्षिप्त अनुपात और सार
यिर्मयाह 31:18 में कहा गया संकेत—ताड़ना की चोट कितनी भी कठोर हो, परन्तु परमेश्वर के सामने लौटना और उसका प्रेम स्वीकार करना संभव है। यह वचन एप्रैम के संदर्भ में भी एक आशा-भरा संदेश देता है कि भले ही यातना आई हो, परमेश्वर के साथ भरोसेमय रिश्ते को फिर से शुरू किया जा सकता है।
संक्षिप्त उद्धरण (निकाले गए) — यह स्थान मैथ्यू हेन्री, ऐल्बर्ट बार्न्स या एडम क्लार्क के क्रियात्मक टिप्पणियों के सीधे पूर्ण उद्धरण नहीं देता; परन्तु उनके विचारों का सार यहाँ समाहित है: परमेश्वर के प्रेम की पुनर्स्थापना की आशा और पश्चाताप के द्वारा strengthened संबंध की पुष्टि।