यिर्मयाह 31:6 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

क्योंकि ऐसा दिन आएगा, जिसमें एप्रैम के पहाड़ी देश के पहरुए पुकारेंगे: 'उठो, हम अपने परमेश्‍वर यहोवा के पास सिय्योन को चलें।'”

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यिर्मयाह 31:6 पद-दर-पद बाइबल टीका

यिर्मयाह 31:6 पर टिप्पणी

इस पद में भविष्य की एक आशा-पत्रिका दिखाई देती है: एप्रैम के पहाड़ी देश के पहरुए यह कहते हुए उठेंगे कि हमें अपने परमेश्वर यहोवा के पास सिय्योन जाना चाहिए। यह संदर्भ निर्जीव राजनीति की निराशाओं के बजाय परमेश्वर के शाश्वत वादे की ओर संकेत करता है—यहोवा लौट आएंगे और उनका संताप नहीं, उनके उद्धार का दिन आएगा। यिर्मयाह के बाइबल संदर्भ में यह संदेश यह दर्शाता है कि दण्ड के समय भी परमेश्वर के चुने हुए लोग अपने धार्मिक/आस्था के केन्द्र पर लौटने का आग्रह करेंगे, और यहूदा-इजरायल के विभाजन के बाद पुनः एकता और श्रद्धा की योजना की ओर इशारा है।

मुख्य अर्थ

पद कहता है कि भविष्य में एप्रैम के पहाड़ी देश के पहरुए उठेंगे और सिय्योन अर्थात यरूशलेम की ओर चलेंगे—यह एक आध्यात्मिक वापसी और परमेश्वर के साथ पुनः संबंध स्थापित करने की चाह है। यह उद्धार का एक नया मोड़ है, जहाँ लोग अपने गड़बड़ पथ को छोड़कर भगवान के पास लौटना चाहते हैं। यह वादा यह भी दर्शाता है कि यहोवा के साथ एक ऐसी यात्रा है जिसमें विश्वास और निर्भरता पुनः मजबूत होती है, न कि राजनीति या युद्ध-नीति पर निर्भरता।

तीन प्रमुख विषय

  • वापसी और विश्वास का मार्ग: परमेश्वर के पास लौटना एक जीवित, दैनिक निर्णय है जो कठिन समय में भी आशा देता है।
  • समझ और पहचान: एप्रैम के पहाड़ों से निकलकर सिय्योन की तरफ बढ़ना यह दर्शाता है कि भौगोलिक प्रतीकों से अधिक यह आंतरिक परिवर्तन है—परमेश्वर-केन्द्रित दृष्टिकोण।
  • यहोवा की वाचा पर भरोसा: यह वाक्य, निराशाजनक समय में भी, चर्चित संदेश देता है कि मोड़-फेर संभव है जब परमेश्वर की ठहरती हुई योजना पर लोग भरोसा रखें।

संबद्ध अंश

– यिर्मयाह 3:22–25 (पश्चात्त्व में वापस लौटने की आशा) यह संकेत देता है कि परमेश्वर के साथ बारीकी से जुड़ना ही उद्धार का उपाय है।

– यिर्मयाह 50–51 की परिघटना में बहत्तर बंधनों से मुक्ति और एक नयी दूरी से नहीं, बल्कि एक नयी यात्रा की घोषणा मिलती है।

– जीसस के यीशु-आविर्भाव में यह स्पष्ट करता है कि हर दिल से लौटना और विश्वास में मजबूती लाना परमेश्वर की इच्छा है।

व्यावहारिक विचार

क्या आप अपने जीवन के रास्ते में एक ऐसी वापसी की तैयारी कर रहे हैं? कठिन समय में भी यहोवा पर भरोसा बना रहे; अपने आस्थागत स्थान—भाई-बहनों के साथ चर्च, प्रार्थना, और पवित्रशास्त्र अध्ययन के मार्गों के ज़रिए अपने हृदय को सिय्योन की ओर मोड़ें। यहूदियों के इतिहास से सीखता है कि लौटना कठिन हो सकता है, परन्तु ईश्वर की कृपा से पुनर्स्थापना संभव है जब हम अपने विश्वास के रास्ते में स्पष्ट निर्णय लेते हैं।

संयोजनात्मक समापन

यिर्मयाह 31:6 एक भविष्य की दिशाहीनता में भी ईश्वर की ओर लौटने की आशा का संकेत है। यह संदेश हमें यह याद दिलाता है कि सच्चे उद्धार और शांति तब मिलती है जब हम अपने दिल को यहोवा के पास संचालित करते हैं और सिय्योन—इश्वर के सम्मुख सच्चे उपयागी बनते हैं।

पढ़न-संदर्भ (Cross-references)

– यिर्मयाह 3:22: परिशुद्ध शब्दों में लौटना और चंगा होना हमारी आध्यात्मिक दिशा को दृढ़ बनाता है।

– इब्रानी 11:16: वास्तविक शांति के लिए संसार की राजधानी से ऊपर परमेश्वर की राजधानी के साथ सहभागिता जरूरी है।

– योएल 2:32: उद्धार की राह का उल्लेख समाज में फिर से एकता लाने की आशा देता है।

कैस प्रकार के उद्धरण इनमें मिलते हैं: "यहोवा के पास लौटो" जैसे विचार Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के साहित्य में बार-बार उद्धृत होते हैं; यदि आप चाहें तो मैं उनमें से एक-एक छोटा उद्धरण वास्तविक हू-ब-हू संदर्भ सहित दे सकता हूँ।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यिर्मयाह 31:6 समानांतर पद और संबंधित वचन

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“यहोवा की यह वाणी है, कि उन दिनों में इस्राएली और यहूदा एक संग आएँगे, वे रोते हुए अपने परमेश्‍वर यहोवा को ढूँढ़ने के लिये चले आएँगे।

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पहाड़ों पर उसके पाँव क्या ही सुहावने हैं जो शुभ समाचार लाता है, जो शान्ति की बातें सुनाता है और कल्याण का शुभ समाचार और उद्धार का सन्देश देता है, जो सिय्योन से कहता हैं, “तेरा परमेश्‍वर राज्य करता है।” (प्रेरि. 10:36, रोम. 10:15, नहू. 1:15)

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अन्त के दिनों में ऐसा होगा कि यहोवा के भवन का पर्वत सब पहाड़ों पर दृढ़ किया जाएगा, और सब पहाड़ियों से अधिक ऊँचा किया जाएगा; और हर जाति के लोग धारा के समान उसकी ओर चलेंगे।

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