Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
यिर्मयाह 31:1 यिर्मयाह 31:2 यिर्मयाह 31:3 यिर्मयाह 31:4 यिर्मयाह 31:5 यिर्मयाह 31:6 यिर्मयाह 31:7 यिर्मयाह 31:8 यिर्मयाह 31:9 यिर्मयाह 31:10 यिर्मयाह 31:11 यिर्मयाह 31:12 यिर्मयाह 31:13 यिर्मयाह 31:14 यिर्मयाह 31:15 यिर्मयाह 31:16 यिर्मयाह 31:17 यिर्मयाह 31:18 यिर्मयाह 31:19 यिर्मयाह 31:20 यिर्मयाह 31:21 यिर्मयाह 31:22 यिर्मयाह 31:23 यिर्मयाह 31:24 यिर्मयाह 31:25 यिर्मयाह 31:26 यिर्मयाह 31:27 यिर्मयाह 31:28 यिर्मयाह 31:29 यिर्मयाह 31:30 यिर्मयाह 31:31 यिर्मयाह 31:32 यिर्मयाह 31:33 यिर्मयाह 31:34 यिर्मयाह 31:35 यिर्मयाह 31:36 यिर्मयाह 31:37 यिर्मयाह 31:38 यिर्मयाह 31:39 यिर्मयाह 31:40



यिर्मयाह 31:37 पर दृष्टिकोण
यिर्मयाह की पुस्तक में यह उद्धारक प्रासंगिक संदेश है कि परमेश्वर के वचन और योजनाओं के सन्निकटता-प्रकार से भी अधिक स्थिर कुछ नहीं है। 31:37 उस समय की ईश्वरीय gums-सीमा को दिखाता है जब परमेश्वर यह स्पष्ट करते हैं कि यदि आकाश मापा जा सके और पृथ्वी की नींव खोदकर भी देखा जाए, तब भी उनकी इच्छा के अनुसार इस्राएल के सभी वंशों के पापों से उन्हें बाहर रखा जाएगा। यह एक आश्वस्ति है कि परमेश्वर अपने चलने के तरीके से बाहर नहीं निकलते और उनका वचन स्थिर है।
पद का अध्याय-सम्बन्ध और पृष्ठभूमि
यिर्मयाह 31 में ईश्वरीय वचन की एक नई बानगी है: दयालु पुनर्जन्म और वाचा-निष्ठा। यहाँ परमेश्वर यह कह रहे हैं कि उनका बना हुआ वादा, यहोशियों के पापों के बावजूद, फिर भी पूरा होगा। यह संदर्श बंधन-सीमा नहीं बल्कि विश्वास-आधार के पुनःस्थापन की घोषणा है। यह उद्धार और भक्ति के नए नियम की पुष्टि है: ईश्वर अपने लोगों के साथ एक नया हृदय और नई रीति-नीति स्थापित करने जा रहे हैं।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
इस Verse का मुख्य संदेश है— परमेश्वर के निर्णय और वचन की दृढ़ता। वह नहीं चाहेंगे कि यह्राइल के लोग या उनके वंश उपेक्षा का शिकार बनें; उनकी पाप-गति चाहे कितनी भी गहरी क्यों न हो, परमेश्वर का प्रेम और दया उससे अधिक है। यह उद्धार-योजना का संकेत है जिससे यहूदियों और अन्य जातियों के लिए भी नई आशा उत्पन्न होती है: परमेश्वर अपने लोगों को एक नई नींव पर खड़ा करेगा।
प्रचारित शिक्षण: अन्य पदों से सम्बद्धता
1) यशैया 55:11 की वाक्य-सीमा, जहाँ परमेश्वर का वचन अवश्य पूरा होता है; 2) यरमायाह 33:20–21 में नया वचन और स्थिर बनना— परमेश्वर का वचन नभ-भूमि तक स्थिर रहता है; 3) रोम 11:29 में परमेश्वर के बुलावे और अनुग्रह की अपरिवर्तनीयता। इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि परमेश्वर की योजना पाप के बावजूद भी पूरी होनी है और उसका आशीर्वाद उसका वादा है जो निर्बल को भी उद्धार देता है।
आचरण के लिए अनुप्रयोग
क्रॉस-रेफरेंसेस और उनसे जुड़ा छोटा स्पष्टीकरण
• यशैया 55:11: परमेश्वर के वचन का प्रभाव और पूर्णता— जो निकलकर आता है, वह निष्फल नहीं होता।
• यरमयाह 33:20–21: नया वादा और स्थायित्व— परमेश्वर की योजना समय के साथ नहीं डगमगाती।
• रोम 11:29: ईश्वर के बुलावे में परिवर्तन नहीं आता— उनका अनुग्रह अविकल रहता है।
संक्षिप्त सार
31:37 की רוח में यह स्पष्ट है कि परमेश्वर अपने वचनों और वादों की पूर्णता চান, चाहे आकाश-नीचे की परिमाण भी जो हो जाए। यहूत और अन्यजातियों के लिए निरंतर आशा का स्रोत है: ईश्वर अपने लोगों को उद्धार और नए जीवन के अनुरूप ढालते हैं, उच्च-नीच नहीं, स्थिर विश्वास और विनम्रता के साथ।