Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
यिर्मयाह 50:1 यिर्मयाह 50:2 यिर्मयाह 50:3 यिर्मयाह 50:4 यिर्मयाह 50:5 यिर्मयाह 50:6 यिर्मयाह 50:7 यिर्मयाह 50:8 यिर्मयाह 50:9 यिर्मयाह 50:10 यिर्मयाह 50:11 यिर्मयाह 50:12 यिर्मयाह 50:13 यिर्मयाह 50:14 यिर्मयाह 50:15 यिर्मयाह 50:16 यिर्मयाह 50:17 यिर्मयाह 50:18 यिर्मयाह 50:19 यिर्मयाह 50:20 यिर्मयाह 50:21 यिर्मयाह 50:22 यिर्मयाह 50:23 यिर्मयाह 50:24 यिर्मयाह 50:25 यिर्मयाह 50:26 यिर्मयाह 50:27 यिर्मयाह 50:28 यिर्मयाह 50:29 यिर्मयाह 50:30 यिर्मयाह 50:31 यिर्मयाह 50:32 यिर्मयाह 50:33 यिर्मयाह 50:34 यिर्मयाह 50:35 यिर्मयाह 50:36 यिर्मयाह 50:37 यिर्मयाह 50:38 यिर्मयाह 50:39 यिर्मयाह 50:40 यिर्मयाह 50:41 यिर्मयाह 50:42 यिर्मयाह 50:43 यिर्मयाह 50:44 यिर्मयाह 50:45 यिर्मयाह 50:46



यिर्मयाह 50:37 पर टिप्पणी
पाद:Yिर्मयाह 50 में भविष्यवाणी बाबुल की नष्टि के संदर्भ में है। इस विशिष्ट पद में युद्ध की क्रूरता और तबाही दर्शायी गयी है; क्षमा नहीं, बल्कि उसकी रौद्र सत्ता और उसकी रक्षा-व्यवस्था का विफल होना स्पष्ट होता है। बन्धु-गुट, तलवार, और लूट के चित्र एक व्यापक दिव्य न्याय के संदेश को संकेतित करते हैं: जो अत्याचार करता है, उसका शासन क्षणभर का है और ईश्वर उसे सज़ा देगा।
मुख्य अर्थ
यह वाक्य सवारों, रथियों, और सभी मिल-जुले लोगों पर तलवार के चलने के परिणाम को बयान करता है—यह विनाश का दृश्य है जहाँ बलिष्ठ उपनिवेश और साम्राज्य-निर्माताओं के पास जबरदस्त सत्ता होते हुए भी अंततः परास्त होते हैं। साथ ही यह भण्डारों की लूट और स्त्रियों के नुकसान के माध्यम से दुष्ट शासन की सम्पूर्णता पर चोट करता है। ये सब कर्मों का दिव्य न्याय है, जो परमेश्वर के शास्त्रानुसार निर्दोषों के विरुद्ध अत्याचार और पाप की परिणति है।
दो-तीन मुख्य विषय
अन्य सम्बन्धी पद (cross-references) के छोटे उल्लेख
इन संदर्भों से दिखता है कि पूरब-राष्ट्रों का उन्नति-यत्न अंततः परमेश्वर के न्याय के अधीन है; अत्याचार के नाश के साथ सत्य और धर्म का उभरना संभव है।
व्यावहारिक चिंतन
हमारी सांसारिक स्थिति चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, परमेश्वर की न्याय प्रणाली से ऊपर नहीं है। असत्य के विरुद्ध ईमानदारी और धर्म के रास्ते अपनाने वाले लोगों के लिए यहVerse एक चेतावनी भी है कि सच्चाई और दया के मार्ग को छोड़ना विनाश की ओर ले जाता है। आत्म-निरीक्षण करें: क्या हम अपने जीवन में अन्याय के साथ नहीं जुड़ते? क्या हम अपने भाई-बहनों के प्रति दया और सुरक्षा दिखाते हैं?
संक्षिप्त निष्कर्ष
यिर्मयाह 50:37 एक स्पष्ट स्मरण कराता है कि प्रभु का न्याय सभी अत्याचारों पर प्रभावी है। सत्ता चाहे कैसी भी हो, उसकी रक्षा-व्यवस्था परमेश्वर के हाथों में है। नष्टिकरण और लूट के चित्र एक चेतावनी हैं कि पाप का परिणाम है—पर वही मिसालें यह भी संकेत करती हैं कि परमेश्वर न्याय करके ध्वंस के बाद भी धर्म की पुन:स्थापना कर देंगे।
उद्धरण नोट: इस पंक्ति के साथ Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के सीधी पूर्ण उद्धरण मौलिक पाठ से लिए गए हो सकते हैं; नीचे उनके विचारों के संग एक संयुक्त सार प्रस्तुत है:
Matthew Henry के अनुसार यह अत्याचार का दृश्य है जो परमेश्वर के न्याय के सामने असहाय हो जाता है; Barnes और Clarke इसे प्राकृत रूप से Babylonia के विनाश के लिए एक नीतिपरक चेतावनी मानते हैं।