Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 51:13 पर नवीन व्याख्या
पद में बृहत जलाशयों के बीच बसी और भण्डार से भरी नगर-बस्ती की चर्चा है, जो संचालक लोग अपने लोभ और ऐश्वर्य में मग्न रहते हैं। यिर्मयाह नबी के माध्यम से परमेश्वर सचेत करते हैं कि ऐसे भण्डार-आडंबर और विलासिता का समय समाप्त हो चुका है; यह प्रभु के न्याय के लिए संकेत है। जो बाजार, भण्डार और महिमा पर निर्भर रहते हैं, उनकी हानि और उद्धार का दिन आ चुका है।
केंद्रीय आशय
ईश्वर यहाँ दिखाते हैं कि धन-संपदा और स्थिति-प्रतिष्ठा कभी-भी स्थायी नहीं हैं। लोग जो जलाशयों से घिरे, भण्डारों से लदी हुई नगरों पर निर्भर होते हैं, उन्हें अपने अहंकार और लोभ का परिणाम भुगतना होगा। पराक्रम और संपत्ति का शानMercy नहीं, इश्वर का न्याय है जो शक्ति-आधारित निर्भरता की जड़ काट देता है। यह संदेश प्रकट करता है कि सभ्यता की समृद्धि पर ही नहीं, बल्कि उसकी पतन पर भी ईश्वर का निर्णय लागू होता है।
मुख्य विषय वस्तुएँ
संदर्भ-सम्बन्ध
1) प्रका. 17:1,15— छल-ध्वंस और व्यभिचार-राज्य के प्रतीक के रूप में, दुनिया की राजनीतिक-धार्मिक व्यवस्था का ढहना संकेत देता है; अर्थ यह कि जीवन के अस्थायी स्रोतों पर अटूट भरोसा टिक नहीं सकता।
2) यिर्मयाह 50:46— परमेश्वर के आक्रमण और राष्ट्रों की परास्ति की चेतावनी जो असत्य-उत्पत्ति और लोभ के कारण होती है।
3) यिर्मयाह 51:29— विरह और पृथ्वी-भवन की ध्वंस की घोषणा, जो संदेश के साथ न्याय के समय की तैयारी को दर्शाता है।
व्यावहारिक चिंतन
व्यक्ति या समुदाय के लिए यह शिक्षा है कि धन-संपदा एक अस्थायी सहायता है, पर परमेश्वर के साथ प्रेम और नीति-संयम स्थायी हैं। अपने लोभ को पहचानें, और यह समझें कि आज की समृद्धि कल की चिंता नहीं, बल्कि ईश्वर के साथ निर्भर रहने की परीक्षा है। संतोष, दया और न्याय जैसे मूल्य जीवन के केंद्र में रखकर हम अस्थिरताओं से सुरक्षित रह सकते हैं।
संक्षेप
यिर्मयाह 51:13 परमेश्वर की चेतावनी है कि जो महान जलाशयों और भण्डारों पर निर्भर रहते हैं, उनके लिए समय समाप्त हो सकता है। यह न्याय और विनाश का संकेत है, जो लोभ-प्रधान समाज पर लागू होता है। विश्वास के वास्तविक केन्द्र भगवान की गणना है—not merely संपत्ति या स्थिति।
संक्षिप्त cross-reference स्पर्श
ईश्वर के न्याय और हार-जीत के संकेतों से, यह पद प्रकट करता है कि निर्भरता का सही केंद्र कौन है।
Note: इस पाद के लिए Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के स्पष्ट उद्धरण उपलब्ध होने पर वे आवश्यक स्थानों पर शामिल किए जाते हैं; नीचे कोई सटीक उद्धरण नहीं दिए जा रहे जब तक वे पंक्ति-आधारित न हों।