Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 51:28 पर एक दृष्टि
यिर्मयाह की पुस्तक में यह वाक्य वह संदेश प्रस्तुत करता है जो बाबुल के विरुद्ध सामाजिक-और सैन्य तैयारी की चेतावनी देता है। परमेश्वर के पवित्र भविष्यवक्ता Yahweh को समर्पित रहे राष्ट्रों के बीच अपनी न्यायिक कार्रवाइयों को उद्घाटित करते हैं। यहाँ न केवल शहीदों की सूची बनती है, बल्कि विश्वासयोग्य मनुष्य के लिए धर्मी निर्णय और प्रमाद से बच निकलने का आग्रह रहता है। यह वचन एक कुलीन और शक्तिशाली साम्राज्य के विरुद्ध उचित तैयारी का आह्वान है, ताकि ईश्वरीय न्याय की प्रक्रिया संचालित हो सके।
कथा में उसका हिस्सा
यिर्मयाह 51 अध्याय बाबुल के विनाश के परिप्रेक्ष्य में पृथ्वी के राज्यों के बीच विभाजन और दुष्ट शासन के अंत की घोषणा करता है। इस पंक्ति में स्पष्ट है कि परमेश्वर उन शक्तिशाली राष्ट्रों को एक व्यापक रणनीति के साथ तैयार रहने को कहता है—देवदूतों की निगरानी में, राष्ट्राध्यक्षों से लेकर देश-देशों तक, ताकि उनके हिंसक प्रकोप का निष्कर्ष निकले। यह चेतावनी न केवल राजनीतिक कदमों के बारे में है, बल्कि मनुष्य की हृदय-स्थिति के बारे में भी है: अधिपतियों के साथ एक दायित्व-योजना जो न्याय की स्थापना में सहायक हो।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
इस वचन का मूल पाठ यह दिखाता है कि परमेश्वर अपनी योजना में विश्व के शासन-तंत्रों को एकत्रित करता है ताकि उसके निर्णय सत्यापित हों। भले ही यह विरुद्ध दिखे, परन्तु ईश्वरीय न्याय की प्रक्रिया अडिग रहती है। विश्वासयोगी के लिए पाठ एक सुरक्षित विश्वास की पहचान कराता है: मौत, विनाश या अन्याय के समय भी परमेश्वर की योजनाएँ सर्वोपरि रहती हैं।
अनुसंधानात्मक तुलना
इन संकेतों से स्पष्ट होता है कि सत्ता चाहे कितनी भी स्थिर क्यों न लगे, परमेश्वर की न्याय-योजना से अछूती नहीं रहती।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
सम्बद्ध कथन और संकलन
यिर्मयाह के परिप्रेक्ष्य से यह अध्याय हमें यह याद दिलाता है कि शक्तिशाली साम्राज्यों की चालाकी और धारणाओं के बीच परमेश्वर का नियम चलता रहता है। नीचे दिए गए तीन cross-references इस विचार को मजबूत करते हैं:
संक्षेप में, यह वचन उन लोगों के लिए है जो शक्तिशाली दुष्ट शासन के सामने भी विश्वास और नैतिकता को बनाए रखना चाहते हैं, क्योंकि परमेश्वर की योजना और न्याय अंततः क्रियान्वित होती है।
संक्षेप
यिर्मयाह 51:28 एक चेतावनी है: समाज-राजनीति में कठोर कदम उठाने होंगे ताकि परमेश्वर के न्याय की प्रक्रिया स्पष्ट हो। यह सुन्दर रूप से पुष्टि करता है कि सत्ता चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, परमेश्वर के आदेश का पालन करना चाहिए, ताकि अन्ततः सच्चाई, दयालुता और न्याय टिके रहें।
मॉडल उद्धरण (अगर उपलब्ध): Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke से छोटे उद्धरण