Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 51:25 पर टिप्पणी (HINIRV)
परोक्ष शब्दों में यह वचन स्पष्ट करता है कि परमेश्वर पाशविक प्रभावों या अस्थिर सामर्थ्यों पर नहीं बल्कि उन पहाड़ों पर भी प्रभु का न्याय कूट-कथन करता है जिनके द्वारा पृथ्वी के अनेक भाग ढहते दिखते हैं। यहाँ "नाश करनेवाले पहाड़" से आशय उस विध्वंस से है जिसका परमेश्वर अपने दैवीय न्याय के हाथ बढ़ाकर किया है। यह संदेश एक समय-सारिणी में भी है—यहूदी बनाम बर्बरताओं के दौर में, जब राष्ट्र अपने पथ से भटक रहे थे, तब परमेश्वर की बुलाहट और संवेदना स्पष्ट रूप से सामने आती है।
पठन-आदर्श: इस अध्याय के भीतर के संदर्भ में
यिर्मयाह ने बँटवारे, आत्म-विश्वास और पाप के प्रभावों का क्रूर सच उजागर किया है। 51वाँ chapitre निर्भरता का प्रश्न उठाता है: परमेश्वर अपने लोगों को उद्धार देता है, पर जो उनके विरुद्ध उठते हैं—जिन्हें वह "नाश करनेवाले पहाड़" कहता है—उनका अंत उसी न्याय से होगा जिससे वे दूसरों को डराते रहे हैं। इस संदर्भ में न केवल नीति-संहार, बल्कि भौतिक विनाश भी संकेतित है, ताकि धर्मसत्य का स्वर उच्च होकर गूंजे कि परमेश्वर न्यायप्रिय है और दुख-संताप के पीछे उसका दिव्य उद्देश्य है।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
इस वचन का मूल संदेश यह है कि: - परमेश्वर अपने विरूद्व उठने वाले हर शक्तिशाली ढांचे को गिराने के लिये तैयार है। - निश्चय ही वह पहाड़—जो लोगों के विश्वास-आत्मसमर्थन को प्रतीक बनते—उसे ढाँगों से लुढ़का देगा और उसे जला हुआ बना देगा। यह परिवर्तन भीतर-बाहर से समन्वित न्याय का प्रतीक है।
अनुवाद-तुलना और अन्य दृष्टिकोण
पवित्रता के पथ पर संदेशा साफ है: मैं तुम्हारे विरुद्ध हूँ, ताकि मैं तेरा अत्याचार-बंधन नाश कर दूँ। इसी शाब्दिक संरचना के कारण क्लासिकल टिप्पणीकारों में 1) Matthew Henry, 2) Albert Barnes, 3) Adam Clarke ने इसे चरितार्थ करते समय देव-निर्णय और उद्धार के समकक्ष अर्थ दिए हैं—जो सीधे तौर पर यह सिखाते हैं कि देवता के न्याय के सामने शक्तियाँ निर्बल हो जाती हैं। Henry कहते हैं कि यह नागरिक-न्याय का उद्घोष है, Barnes इसे दुष्ट साम्राज्यों के विनष्ट होने के संकेत के रूप में देखते हैं, और Clarke इस चेतावनी को परमेश्वर की महिमा के उद्घाटन के रूप में प्रस्तुत करते हैं। (उद्धरण के रूप में इन अनुभागों के संक्षिप्त सूत्रार्थ नीचे दिए गए हैं।)
क्रॉस-रेफरेंस और उनका छोटा तर्क
इन संदर्भों में एक बात स्पष्ट है: परमेश्वर का न्याय कभी व्यक्तिगत अन्याय नहीं, बल्कि पथभ्रष्ट व्यवस्था के विरुद्ध विश्व-रक्षक उद्देश्य का भाग है।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
संक्षिप्त सार
यिर्मयाह 51:25 से स्पष्ट होता है कि परमेश्वर उन पहाड़ों, शक्तियों और ढाँचों को नहीं छोड़ते जो अन्याय और अत्याचार के माध्यम से पृथ्वी को दबाए रखते हैं। वे एक समय-दृष्टि में गिरते हैं और एक पवित्र, निष्कपट और उद्धारकारी दृष्टिकोण से इनका खात्मा होता है। यह संदेश भरोसे और पवित्र न्याय की गाथा है: परमेश्वर सत्य और न्याय के साथ है, और उसकी राह में किसी दुष्ट के साथ समझौता नहीं होता।
युक्त उद्धरण (मर्यादित): Matthew Henry और Albert Barnes तथा Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणियों में इसी प्रकार के अर्थ-वाचन मिलते हैं: वे दृढ़ कराते हैं कि परमेश्वर के न्याय के सामने दिल से लौटना चाहिए; नाश और ध्वंस वही नहीं जो पल-भर के लिए भय दिखाते हैं, बल्कि परमेश्वर की महिमा को स्थापित करने के लिए एक नियम के रूप में काम करते हैं।