Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 51:17 (HINIRV) का पाठ-व्याख्या
यिर्मयाह नबी के वक्त यह पाठ बाबत बैकिंग स्थितियों में है, जहाँ भगवान ने बाबुल के विरुद्ध भविष्यवाणी की और नबियों के मूर्तिपूजा-चलन पर गहरा प्रहार किया। इस वाक्य में परमेश्वर के न्याय और मानव-आस्तित्व की सच्चाई स्पष्ट होती है कि मनुष्य, भले ही कितना भी ऐश्वर्यशाली या कला-प्रशंसित क्यों न हो, अंततः ज्ञानरहित और निर्बल है यदि उसके पास दया-प्रेरित भय नहीं है। यहाँ ‘ज्ञानरहित’ शब्द से मानवीय समझ और मूर्तिपूजा की विराट असफलता उजागर होती है—जो कि साहस, धन और कला के ढांचे से ही नहीं, आत्मिक सत्य से भी बिलकुल भिन्न है।
मुख्य आशय
यह पद यह बताता है कि मूर्तिपूजा और धातु-निर्मित मूर्तियों की आचार-चालित धोखाधड़ी के सामने भी मानवता ज्ञानरहित है। यह चेतावनी देता है कि सारा मानव-समर्थन, धातु-कलाओं के ढंग, और शिल्प-निर्माण भी समय की कसौटी पर अस्थिर है जब तक उनमें प्रत्यक्ष ज्ञान, भय और भरोसा परमेश्वर के प्रति नहीं है।
2–3 प्रमुख विषय
संदर्भों से सम्बद्ध बिंदु
1) यिर्मयाह 10:3-5 में मूर्तियों की असत्यता और उनके नष्ट होने का वर्णन मिलता है—जहाँ नबी मूर्तियों के स्वाभाविक ढंग पर कटाक्ष करता है कि वे बोलती नहीं और न ही चेतावनी दे सकतीं।
2) रोम 1:22-23 के धर्म-प्रतिष्ठियों के बारे में भी ऐसा ही मनोबल मिलता है—गौण ज्ञान के बावजूद वे सत्य को तिरोहित करते हैं और परमेश्वर के स्वरूप से निर्गत बुद्धि को विकृत करते हैं।
3) मत्ती 7:24-27 में जो सत्य-गुणी लोग ईश्वर के वचन के अनुसार चलते हैं, वे ढहने वाले घरों के समान नहीं रहते; जबकि अज्ञान-आधारित जीवन संकट में पड़ता है।
व्यावहारिक विचार
आज भी हमारी संस्कृति में कला, विज्ञान और धन के बनाए सामाजिक ढांचे में कुछ भी स्थाई नहीं लगता, जब तक हम परमेश्वर के साथ वास्तविक संबंध नहीं बनाते। यह पद सचेत करता है कि आत्मिक ज्ञान सबसे महत्त्वपूर्ण है—ताकि हम धोखे की बंदिशों से बचें और प्रत्यक्ष ईश्वर-आलोक में चलें। जीवन के निर्णयों में सत्य-आधार बनाएं, न कि मनुष्यों की क्षणिक धारणाओं पर टिके रहें।
छोटा क्रॉस-रेफरेंस सार
• यिर्मयाह 10:3–5 — मूर्तियों की असत्यता स्पष्ट है; केवल ईश्वर की सच्चाई ही स्थिर है।
• रोम 1:22–23 — ज्ञान के ढांचे में ढहना और परमेश्वर-प्रतिमा को धरोहर मानना।
• मत्ती 7:24–27 — वास्तविक जीवन-निर्णयों में ईश्वर-आधार की महत्ता।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यिर्मयाह 51:17 शाब्दिक रूप से बताता है कि मनुष्य परिशुद्ध ज्ञान से दूर हैं और मूर्तिपूजा की ठोस-ढालें भी धोखा देती हैं। परमेश्वर की चेतावनी है कि ढाले हुए अवयवों पर नहीं, परमेश्वर के सत्य पर टिके रहना ही जीवन-सफर का असली ज्ञान है।