यिर्मयाह 51:17 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

सब मनुष्य पशु सरीखे ज्ञानरहित है; सब सुनारों को अपनी खोदी हुई मूरतों के कारण लज्जित होना पड़ेगा; क्योंकि उनकी ढाली हुई मूरतें धोखा देनेवाली हैं, और उनके कुछ भी साँस नहीं चलती।

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यिर्मयाह 51:17 पद-दर-पद बाइबल टीका

यिर्मयाह 51:17 (HINIRV) का पाठ-व्याख्या

यिर्मयाह नबी के वक्‍त यह पाठ बाबत बैकिंग स्थितियों में है, जहाँ भगवान ने बाबुल के विरुद्ध भविष्यवाणी की और नबियों के मूर्तिपूजा-चलन पर गहरा प्रहार किया। इस वाक्य में परमेश्वर के न्याय और मानव-आस्तित्व की सच्चाई स्पष्ट होती है कि मनुष्य, भले ही कितना भी ऐश्वर्यशाली या कला-प्रशंसित क्यों न हो, अंततः ज्ञानरहित और निर्बल है यदि उसके पास दया-प्रेरित भय नहीं है। यहाँ ‘ज्ञानरहित’ शब्द से मानवीय समझ और मूर्तिपूजा की विराट असफलता उजागर होती है—जो कि साहस, धन और कला के ढांचे से ही नहीं, आत्मिक सत्य से भी बिलकुल भिन्न है।

मुख्य आशय

यह पद यह बताता है कि मूर्तिपूजा और धातु-निर्मित मूर्तियों की आचार-चालित धोखाधड़ी के सामने भी मानवता ज्ञानरहित है। यह चेतावनी देता है कि सारा मानव-समर्थन, धातु-कलाओं के ढंग, और शिल्प-निर्माण भी समय की कसौटी पर अस्थिर है जब तक उनमें प्रत्यक्ष ज्ञान, भय और भरोसा परमेश्वर के प्रति नहीं है।

2–3 प्रमुख विषय

  • ज्ञान और अज्ञान का अंतर: लोग चाहे कितनी भी प्रतिभा और कला दिखाएं, यदि वे परमेश्वर-ज्ञान से दूर हैं, तो वे वास्तविक ज्ञान से वंचित रहते हैं।
  • मूर्ति-धर्मिता की नाकामी: ढाली हुई मूरतें धोखा देती हैं; वे सांस नहीं लेतीं, इसलिए वे स्वयंसिद्ध भविष्य को नहीं गढ़ सकतीं—जबकि एक सच्चा सांस्कृतिक-मनुष्य वही है जो आत्म-प्रकाश और ईश्वर के साथ चलना जानता है।

संदर्भों से सम्बद्ध बिंदु

1) यिर्मयाह 10:3-5 में मूर्तियों की असत्यता और उनके नष्ट होने का वर्णन मिलता है—जहाँ नबी मूर्तियों के स्वाभाविक ढंग पर कटाक्ष करता है कि वे बोलती नहीं और न ही चेतावनी दे सकतीं।

2) रोम 1:22-23 के धर्म-प्रतिष्ठियों के बारे में भी ऐसा ही मनोबल मिलता है—गौण ज्ञान के बावजूद वे सत्य को तिरोहित करते हैं और परमेश्वर के स्वरूप से निर्गत बुद्धि को विकृत करते हैं।

3) मत्ती 7:24-27 में जो सत्य-गुणी लोग ईश्वर के वचन के अनुसार चलते हैं, वे ढहने वाले घरों के समान नहीं रहते; जबकि अज्ञान-आधारित जीवन संकट में पड़ता है।

व्यावहारिक विचार

आज भी हमारी संस्कृति में कला, विज्ञान और धन के बनाए सामाजिक ढांचे में कुछ भी स्थाई नहीं लगता, जब तक हम परमेश्वर के साथ वास्तविक संबंध नहीं बनाते। यह पद सचेत करता है कि आत्मिक ज्ञान सबसे महत्त्वपूर्ण है—ताकि हम धोखे की बंदिशों से बचें और प्रत्यक्ष ईश्वर-आलोक में चलें। जीवन के निर्णयों में सत्य-आधार बनाएं, न कि मनुष्यों की क्षणिक धारणाओं पर टिके रहें।

छोटा क्रॉस-रेफरेंस सार

• यिर्मयाह 10:3–5 — मूर्तियों की असत्यता स्पष्ट है; केवल ईश्वर की सच्चाई ही स्थिर है।

• रोम 1:22–23 — ज्ञान के ढांचे में ढहना और परमेश्वर-प्रतिमा को धरोहर मानना।

• मत्ती 7:24–27 — वास्तविक जीवन-निर्णयों में ईश्वर-आधार की महत्ता।

संक्षिप्त निष्कर्ष

यिर्मयाह 51:17 शाब्दिक रूप से बताता है कि मनुष्य परिशुद्ध ज्ञान से दूर हैं और मूर्तिपूजा की ठोस-ढालें भी धोखा देती हैं। परमेश्वर की चेतावनी है कि ढाले हुए अवयवों पर नहीं, परमेश्वर के सत्य पर टिके रहना ही जीवन-सफर का असली ज्ञान है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यिर्मयाह 51:17 समानांतर पद और संबंधित वचन

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सब मनुष्य पशु सरीखे ज्ञानरहित* हैं; अपनी खोदी हुई मूरतों के कारण सब सुनारों की आशा टूटती है; क्योंकि उनकी ढाली हुई मूरतें झूठी हैं, और उनमें साँस ही नहीं है। (यिर्म. 51:17-18)

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हबक्कूक 2:18 (HINIRV) »
*खुदी हुई मूरत में क्या लाभ देखकर बनानेवाले ने उसे खोदा है? फिर झूठ सिखानेवाली और ढली हुई मूरत में क्या लाभ देखकर ढालनेवाले ने उस पर इतना भरोसा रखा है कि न बोलनेवाली और निकम्मी मूरत बनाए?

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भजन संहिता 14:2 (HINIRV) »
यहोवा ने स्वर्ग में से मनुष्यों पर दृष्टि की है कि देखे कि कोई बुद्धिमान, कोई यहोवा का खोजी है या नहीं।

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