Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 51:29 पर विचार: बाबेल के देश की उजाड़ि की योजना और उसका प्रभाव
मुख्य interpretive बिंदु: परमेश्वर की योजना के अनुसार बाबेल के देश का विशुद्ध ह्रास और वन्य-उजाड़ण उसकी दीवारों के पीछे भी नहीं छिप सकता; यह वही पवित्र-निर्णय है जो सितारे भी गिनती हैं। यहाँ यह स्पष्ट है कि ईश्वर ने बाबेल की शासन-शक्ति के अंत की व्यवस्था कर दी है, ताकि संसार पर उसकी अत्याचारिता का गहराई से हिसाब हो और उसकी दुष्टता का अंत मानव इतिहास में दिखे। इसलिए पृथ्वी काँपती है और दुःखित होती है—क्योंकि साधारणता से देखा गया तंत्र टूट रहा है और न्यायदान का कदम ठहर नहीं रहा।
पाठ-संदर्भ: साहित्यिक संदर्भ और परमेश्वर के निर्णय की भाषा
यिर्मयाह में यह शास्त्र बाबेल के विनाश की भविष्यवाणी का भाग है, जहाँ उद्धारक भविष्य के भीतर राष्ट्र-राज्यों के नयूनिर्माण की ओर संकेत करते हैं। इस पद में बाबेल के स्थान की प्रकृति, उसकी दुष्टता की गहराई और परमेश्वर की न्याय-योजना एक साथ स्पष्ट होती है। शब्दावली में प्रकटन यह है कि प्रकृति- रूप से हर चीज उसके विरुद्ध व्यवस्थित है; पृथ्वी काँप उठती है और जलवायु, राजनीति और सभ्यता की संरचनाएं प्रभावित होती हैं।
कथासम्बन्धी महत्त्व (Theological significance)
यहाँ परमेश्वर के विरुद्ध चल रहे संघ के विरुद्ध उसका न्याय-संस्कार स्पष्ट है: जो शक्ति अन्याय के साथ मानवता पर शासन कर रही है, उसका अंत उसी ईश्वर के हाथ में है। दया और क्रोध दोनों एक साथ दिखते हैं—एक ओर उद्धार हेतु ना-ना करने वाला समय, अन्य ओर दुष्टत्व के परिणामों का भय। यह संदेश बताता है कि ऐतिहासिक घटनाओं के पीछे एक परम सत्ता का नियंत्रण है, जो समय-समय पर पाप के परिणामों को पलट देता है।
किताबों के बीच संपर्क (Cross-references)
इन संदर्भों से एक सामान्य ध्वनि उभरती है: पृथ्वी-समुदाय की राजनीति और राष्ट्रों की सत्ता परमेश्वर के निर्णय से ही आकार लेती है; न्याय के समय से पहले न तो शक्ति स्थिर रहती है और न ही अत्याचार लंबे समय तक टिकता है।
चार-स्तरीय प्रतिबिंब (Questions for reflection)
संक्षिप्त निष्कर्ष
यिर्मयाह 51:29 में दिखाया गया है कि परमेश्वर विशाल-इतिहास की धारा में भी अपनी योजना से बाबेल जैसी शक्तियों को समापन देता है। पृथ्वी का काँपना और दुःखित होना उसी निवारण-कार्य का संकेत है—न्याय और उद्धार की दिशा में एक निर्णायक मोड़। भय के समय में भी ईश्वर के विरुद्ध टिके हुए शासन का अंत निश्चित है, और यह सुरक्षा हमारे लिए आश्वासन है कि सत्य और पवित्रता के मार्ग पर ईश्वर ही अंतिम निर्णायक हैं।
महत्वपूर्ण उद्धरण (सूचित सीमाएँ)
यदि उपलब्ध हों, तो नीचे Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के सीधे शब्द (छोटे उद्धरण) उद्धृत किए जा सकते हैं:
“यहोवा ने विचारा है कि वह बाबेल के देश को ऐसा उजाड़ करे कि उसमें कोई भी न रहे”—यह विचार Hubukh ke अनुसार, न्याय के दृढ़ संकल्प को दर्शाता है कि पाप की सत्ता अंततः नष्ट होगी।
नोट: उपरिलिखित उद्धरण केवल संकल्पना के संकेत हेतु हैं; पूर्ण पाठ तभी उद्धृत किया जाएगा जब स्रोत स्पष्ट हो।