Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 51:36 का महत्व और संदर्भ
यीशु-निमंत्रण के बजाय यह वचन एक परमेश्वर के आत्मविश्वास और न्याय के धार पर टिकता है। यहोवा कहता है कि वह अपने लोगों के विरुद्ध वेदना-भरे दोषों के मुकद्दमे को स्वयं लड़ेंगे और उनके पक्ष में बदला लेंगे। यह कथन तब आता है जब बंधन और दासत्व के अनुभवों से जूझते इब्रानी लोगों को विश्वास होता है कि जंगल-जंगल युद्ध और अन्धकार के बीच भी परमेश्वर उनका पक्ष लेता है। यह वचन विश्वास के सार को प्रस्तुत करता है: दयालुता और न्याय के साथ परमेश्वर अपने लोगों की रक्षा और उद्धार सुनिश्चित करते हैं।
पार्श्व संदर्भ और मूल संदर्भ
यिर्मयाह-उपनिषद में मन्द-पथ के शिकन-समय के दौरान יהוה यह घोषणा करते हैं कि उन्होंने बाबुल के आक्रमण के विरुद्ध अपने लोगों के लिए न्याय की राह निर्धारित की है। यह उद्धार-योजना उनके विश्वासपात्रों के लिए एक आश्वस्ति है कि आतंक के क्षण में भी परमेश्वर सत्ता में है और उनका मुकद्दमा उनके पक्ष में लड़ेगा। साथ ही यह संदेश देता है कि निरंकुश शक्तियाँ भी एक दिन जवाबदेह होंगी।
मुख्य संदेश
- परमेश्वर अपने लोगों का पक्ष लेते हैं और उनके विरुद्ध के अन्याय पर कार्रवाई करते हैं।
- “तथा मैं उसके ताल को और उसके सोतों को सूखा दूँगा” का अर्थ है शस्त्र-निर्मूलन और शासन-यंत्र के विनाश के द्वारा शांति स्थापित करना।
- यह संदर्भ प्रकट करता है कि दुष्ट व्यवस्था के भीतर भी ईमानदारों का उद्धार संभव है, बशर्ते वे परमेश्वर की ओर दबाव डालें और भरोसा रखें।
पवित्र ग्रंथ से सम्बद्ध थीम
क्रॉस-रेफरेन्स (संकेतित संक्षेप)
कई जगह पवित्रशास्त्र में यह संदेश मिलता है कि परमेश्वर अपने लोगों के विरुद्ध अत्याचार के समय आगे आता है, और उनके रक्षा-कार्य में बुराई का अंत होता है।
प्रकाशन 16:12 का संकल्पनात्मक संदर्भ यह दिखाता है कि दुष्ट शक्तियाँ भी अंततः परमेश्वर के लक्ष्यों के अनुरूप ढलती हैं, जबकि यिर्मयाह के संदर्भ में यह इस्राईली समाज के लिए आश्वासन बनता है कि उनके सामाजिक-राजनैतिक संकट में ईश्वर उन पर उतरकर जवाब देते हैं।
अन्यों संदर्भों में मत्ती 10:34-36 और यशायाह 40–41 अध्यायों के उद्धोष भी इस बात को पुष्ट करते हैं कि परमेश्वर न्याय और उद्धार के लिए योजनाबद्ध कदम उठाते हैं, और विश्वासियों को दृढ़ रहने की प्रेरणा मिलती है।
आध्यात्मिक व्याख्या
यह verse एक नॉर्मल इंसान की तरह नहीं बोलता, बल्कि एक नबी की दृष्टि से बतलाता है कि दुष्ट शासन और असमानताओं के विरुद्ध में परमेश्वर की न्याय-योजना सक्रिय है। यह उद्धार का पहला कदम तब होता है जब संकट में मनुष्य अपने भरोसे को दोहराते हैं और परमेश्वर की सहायता पर निर्भर रहते हैं।
व्यावहारिक विचार और मौलिक प्रभाव
देवोत्तर विचार
जब हम अस्थिर समय में हों, यह वचन स्मरण दिलाता है कि परमेश्वर अपने मुकद्दमे और बदला दोनों तरफ से संभालते हैं। हमारी भूमिका है- ईश्वर पर निर्भर रहना, सही-न्याय की मांग करना, और उनके सिद्ध नर-धर्म के साथ राह बनाना।
अनुदेशात्मक उद्धरण (प्रामाणिक पंक्तियाँ)
यदि आप Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के शब्दों से कुछ उद्धरण देखते हैं, तो वे इस प्रकार के भावों को स्पष्ट करते हैं: “परमेश्वर अपने लोगों के साथ खड़े रहते हैं और उनके शत्रुओं के विरुद्ध न्याय की गवाही देते हैं।”
नोट: इस पंक्ति में पूर्ण उद्धरण उपलब्ध नहीं है; नीचे प्रयुक्त टिप्पणियाँ संक्षेप में रिकॉर्ड की गई हैं।
मुख्य संदर्भित शब्द
यहोवा की प्रतिज्ञा, मुकद्दमा, बदला, ताल और सोतों का सूखना—ये शब्द परमेश्वर के न्यायपूर्ण और उद्धार-कर्ता स्वर के साथ जुड़ते हैं और पाठक को आशा देते हैं कि अत्याचार के बीच भी देव-निर्णय सुरक्षित है।