यिर्मयाह 51:62 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

और यह कहना, 'हे यहोवा तूने तो इस स्थान के विषय में यह कहा है कि मैं इसे ऐसा मिटा दूँगा कि इसमें क्या मनुष्य, क्या पशु, कोई भी न रहेगा, वरन् यह सदा उजाड़ पड़ा रहेगा।'

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यिर्मयाह 51:62 पद-दर-पद बाइबल टीका

यिर्मयाह 51:62 का पठन-संदेश

इस वचन में यिर्मयाह को यह सम्बोधित किया गया कि भविष्यवाणी के अनुसार बर्लुसलम पर क्या होने वाला है। यहाँ यह घोषणा निकलती है कि यह स्थान ऐसा मिट जाएगा कि उसमें मनुष्य या पशु किसी का भी ठहरना नहीं रहेगा, यह स्थान सदा अन्नी-उजाड़ पड़ जाएगा। यह उद्धारक-गीतात्मक उच्चारण एक विशेष संदेश देता है: परमेश्वर का निर्णय इतिहास के निर्णायक मोड़ पर आता है, और वह लोगों के धर्म-व्यवहार का फल दिखाता है।

मुख्य आशय

यह भयावहकरणा भविष्यवाणी एक निर्भीक स्पष्टता से बताती है कि दुष्कर्मों के परिणामस्वरूप नगर पर परमेश्वर की कठोर दया और न्याय एक साथ आते हैं। साथ ही यह विश्वास कराती है कि परमेश्वर के निर्णय समय-समय पर होते हैं, ताकि राष्ट्र के लोगों को उनके कर्मों के लिए सचेत किया जा सके।

दो-तीन मुख्य विषय

  • नश्वरता बनाम दिव्यता: पृथ्वी पर नगरों का निर्माण मानव-चेतना से हुआ है, परंतु परिणाम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार तय होते हैं। यह वचन स्थिति-परिवर्तन की चेतावनी देता है कि किस प्रकार निर्बोध आचरण सामाजिक-आस्था को ध्वस्त कर सकता है।
  • उद्योग-निष्कासन और स्थायित्व का प्रश्न: स्थायी उजाड़पन से यह संकेत मिलता है कि मनुष्यों का पथ किस प्रकार टूट-फूट के साथ समाप्त होता है, जब वे परमसत्ता के निर्देशों से विमुख रहते हैं।
  • उद्धार की प्रतीक्षा बनाम न्याय: जहाँ एक ओर यह स्पष्ट कहता है कि कुछ सांसारिक स्थानों का अंत होता है, वहीं परमेश्वर की दया और न्याय का संतुलन भी दिखता है; वे अपने लोगों के लिए सही निर्णय लेते हैं और फिर भी उद्धार के अवसर छोड़ते नहीं।

संदर्भगत संबद्ध passages

– निराकरण और प्रतिशोध के विषय पर ये अन्य संदर्भ भी मार्गदर्शक हैं: दानिएल 4:13-17 (उद्धार-नियमन और सत्ता के साथ कठोर निर्णय), यिर्मयाह 25:12-14 (नष्टि के बाद भी प्रभु की नियति की पुनरावृत्ति), योहान 15:6 (असफलता की परिणति और निर्भरता)। इन उपदेशों से समझ बनती है कि परमेश्वर इतिहास के भीतर धर्म के पालन की महत्ता को कैसे मानते हैं और जो न करें उन्हें कैसे परिणाम भुगतने पड़ते हैं।

व्यावहारिक विचार

हम अपने दैनिक जीवन में यह पूछ सकते हैं: क्या हमारे आचरण परमेश्वर के निर्देशों के अनुरूप हैं? यदि नहीं, तो यह वचन स्मरण कराता है कि दुष्कर्म के परिणाम सामाजिक और व्यक्तिगत नुकसानों के रूप में सामने आते हैं। परन्तु आशा भी है कि परमेश्वर ने उसे चेतावनियां दी हैं ताकि लोग खुद को सचेत रखें और पुनः विश्वास में लौटें।

संक्षिप्त निष्कर्ष

यिर्मयाह 51:62 बताता है कि परमेश्वर के न्याय का समय आता है जब शहर और राष्ट्र अपनी गलतियों के कारण उजाड़ हो सकता है, पर यह भी संकेत है कि परमेश्वर के निर्णय के पीछे उद्धार की राह और पश्चाताप के अवसर भी उपलब्ध रहते हैं।

टिप्पणियाँ

यहाँ महात्मा-हेनरी, अॅल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के आधिकारिक विचारों की संक्षेपित प्रेरणा इन प्रविष्टियों से मिलती है—परन्तु हमने उनकी पूर्ण पंक्तियों को उद्धृत नहीं किया है। उनके विचार सामान्यतः यह दिखाते हैं कि न्याय और दया के बीच संतुलन कैसे चलते हैं और कैसे परमेश्वर के निर्णय इतिहास को दिशा देते हैं।

क्रॉस-रेफरेंसेस

1) यिर्मयाह 25:12 – राष्ट्र के अंत के साथ न्याय का क्रम; 2) दानिएल 4:13-17 – सत्ता और निर्णय की दायित्वपूर्ण राजधानी; 3) योहन् 15:6 – निर्भरता और परिणाम के संकेत।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यिर्मयाह 51:62 समानांतर पद और संबंधित वचन

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यिर्मयाह 50:13 (HINIRV) »
यहोवा के क्रोध के कारण, वह देश निर्जन रहेगा, वह उजाड़ ही उजाड़ होगा; जो कोई बाबेल के पास से चलेगा वह चकित होगा, और उसके सब दुःख देखकर ताली बजाएगा।

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यिर्मयाह 50:3 (HINIRV) »
क्योंकि उत्तर दिशा से एक जाति उस पर चढ़ाई करके उसके देश को यहाँ तक उजाड़ कर देगी, कि क्या मनुष्य, क्या पशु, उसमें कोई भी न रहेगा; सब भाग जाएँगे।

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यशायाह 14:22 (HINIRV) »
सेनाओं के यहोवा की यह वाणी है, “मैं उनके विरुद्ध उठूँगा, और बाबेल का नाम और निशान मिटा डालूँगा, और बेटों-पोतों को काट डालूँगा,” यहोवा की यही वाणी है।

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